मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल, जिसे झीलों और हरियाली का शहर कहा जाता है, एक बार फिर विकास बनाम पर्यावरण की बहस के केंद्र में आ गया है। शहर की सबसे व्यस्त सड़कों में शामिल अयोध्या बाईपास पर चल रही सड़क चौड़ीकरण परियोजना के तहत हजारों पेड़ों की कटाई शुरू हो चुकी है, जिससे स्थानीय लोगों और पर्यावरण विशेषज्ञों में गहरी चिंता पैदा हो गई है।

4 लेन से 10 लेन तक का विस्तार
इस परियोजना के अंतर्गत अयोध्या बाईपास की मौजूदा चार लेन सड़क को छह लेन में बदला जा रहा है। इसके साथ ही दोनों ओर दो-दो सर्विस लेन बनाई जाएंगी। इस तरह यह पूरा मार्ग लगभग 10 लेन का ट्रैफिक कॉरिडोर बन जाएगा। प्रशासन का दावा है कि इससे ट्रैफिक जाम की समस्या में राहत मिलेगी।
7,871 पेड़ों की कटाई
भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) द्वारा लागू इस परियोजना में कुल 7,871 पेड़ों को काटने की अनुमति दी गई है। पहले यह आंकड़ा करीब 10,000 बताया जा रहा था। जैसे ही यह जानकारी सामने आई, भोपाल के पर्यावरणविदों, सामाजिक संगठनों और आम नागरिकों ने इस फैसले पर सवाल उठाने शुरू कर दिए।
मामला पहुंचा NGT तक
पेड़ों की कटाई को लेकर विवाद बढ़ने पर मामला राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (NGT) तक पहुंचा। एनजीटी ने परियोजना की समीक्षा के लिए एक विशेष समिति का गठन किया। समिति की रिपोर्ट के बाद सशर्त मंजूरी दी गई, जिसके अनुसार हर कटे पेड़ के बदले 10 पौधे लगाए जाएंगे। यानी लगभग 80,000 नए पौधों का वृक्षारोपण किया जाना प्रस्तावित है।
क्या Eyes पौधे पुराने पेड़ों की भरपाई कर पाएंगे?
NHAI का कहना है कि वृक्षारोपण केवल औपचारिकता नहीं होगा, बल्कि पौधों की निगरानी और संरक्षण के लिए विशेष तंत्र बनाया जाएगा।
हालांकि पर्यावरण विशेषज्ञ इससे सहमत नहीं हैं। उनका कहना है कि दशकों पुराने पेड़ तुरंत नए पौधों से प्रतिस्थापित नहीं किए जा सकते। एक पेड़ को समान पर्यावरणीय लाभ देने में कई साल,甚至 दशकों का समय लगता है।
स्थानीय लोगों की आवाज
स्थानीय निवासी नितिन सक्सेना सहित कई नागरिकों ने इस परियोजना के खिलाफ एनजीटी में याचिका दायर की थी, लेकिन फिलहाल सड़क निर्माण पर रोक नहीं लग सकी। लोगों का मानना है कि चौड़ी सड़कें कुछ समय के लिए राहत दे सकती हैं, लेकिन इसके दीर्घकालिक दुष्परिणाम भोपाल के पर्यावरण को भुगतने पड़ सकते हैं।
भविष्य की सांसों का सवाल
भोपाल आज ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां फैसला सिर्फ बुनियादी ढांचे का नहीं, बल्कि भविष्य की हवा, हरियाली और आने वाली पीढ़ियों का है। विकास जरूरी है, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह विकास हरियाली की कीमत पर ही होना चाहिए?



